उदयपुर। उदयपुर के पूर्व सांसद भानु कुमार शास्त्री की 101वीं जयंती के अवसर पर उनके जीवन पर आधारित पुस्तक ‘ प्रेरणा पुंज’ भानु कुमार शास्त्री का नई दिल्ली में मंत्रालय की आधिकारिक बैठक के समापन पर आयोजित समारोह में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे.पी. नड्डा, केंद्रीय राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल, राज्यमंत्री प्रतापराव जाटव तथा अंडमान एवं निकोबार के उपराज्यपाल डॉ. दिनेश शर्मा ने संयुक्त रूप से पुस्तक का लोकार्पण किया गया।
इस पुस्तक का लेखन केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य हरीश्चंद्र चंद्र शर्मा ने किया है।जीवन के अनछुए प्रसंगों का संकलन-लेखक हरीश्चंद्र शर्मा ने बताया कि इस पुस्तक में शास्त्री जी के जीवन के कई ऐसे अनछुए पहलुओं को सामने लाया गया है, जिनसे आमजन अब तक अपरिचित थे।
उनकी 6 वर्ष की अल्पायु में माताजी के निधन के बाद उनके पिता ने ही उनका लालन-पालन किया। बचपन में वे स्वभाव से नटखट थे और बिना बताए हैदराबाद (सिंध) में सिंधु नदी से जुड़ी फुलेली नहर में तैरने चले जाते थे।
उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा गिदुमल पाठशाला से प्राप्त की और आगे चलकर उन्होंने वाराणसी से शास्त्री की उपाधि अर्जित की।
वे तीक्ष्ण बुद्धि के धनी थे और चुनाव लड़ते हुए भी अपनी पढ़ाई जारी रखते थे।संस्कृत विद्वान और प्रखर वक्ता-शास्त्री जी का हिंदू, हिंदुत्व और भारतीय संस्कृति के प्रति गहरा जुड़ाव था।
उनके गुरु मणिशंकर द्विवेदी उन्हें संस्कृत पढ़ाते थे। शास्त्री जी ने संस्कृत में कई कहानियां भी लिखीं।
प्रसिद्ध साहित्यकार नागार्जुन के साथ उनका गहरा आत्मीय संबंध था; नागार्जुन जब भी उदयपुर आते, शास्त्री जी के आवास पर उनसे मिलने जरूर जाते थे। संतों और विद्वानों की संगति के कारण जानकारों का यह भी मानना था कि यदि वे राजनीति में न होते, तो एक बड़े कवि होते।
स्वतंत्रता के समय देश के विभाजन की विभीषिका पर एक पत्रिका में छपे उनके लेख को पढ़कर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास भी बेहद प्रभावित हुए थे।सादगी और जनसेवा की मिसाल- पुस्तक में उनके सरल स्वभाव, मिलनसारिता और आमजन, विशेषकर गरीबों व वंचितों के प्रति उनकी संवेदनशीलता का भी प्रमुखता से उल्लेख किया गया है।
विमोचन के अवसर पर उपस्थित अतिथियों ने भानु कुमार शास्त्री के राष्ट्र सेवा और शुचिता से भरे जीवन को नई पीढ़ी के लिए अनुकरणीय बताया।1948 में उन्होंने संस्कृत अध्यापक के लिये इन्टरव्यू दिया और उनका चयन भी हो गया लेकिन उन्होंने अपने ज्ञान के भण्डार के सामनें उस पद को अस्वीकार कर दिया।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें उस समय पूर्व मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया के सामनें चुनाव में खड़ा कर दिया जब कोई भी नेता उनके सामनें चुनाव लड़ने के लिये तैयार नंही था।
ऐसे में भानू कुमार शस्त्री भी डगमगा गये लेकिन अटलबिहारी वाजपेयी ने उन्हें कहा कि भानू जी तुम्हें तेरी योग्यता का पता नहंी है तुम चुनाव लड़ो और इस प्रकार उन्होंने अपना पहला चुनाव लडा।
यह पुस्तक अमेज़न, फ्लिपकार्ट, नोशन प्रेस चेन्नई पर मिलेगी।
