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परमात्मा के दर्शन और जिनवाणी का लाभ मिलना अनंत पुण्य का फलःसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी

उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में शुक्रवार को आयोजित नियमित धर्मसभा में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान महावीर ने कठोर साधना के माध्यम से सर्वज्ञता प्राप्त क

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उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में शुक्रवार को आयोजित नियमित धर्मसभा में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान महावीर ने कठोर साधना के माध्यम से सर्वज्ञता प्राप्त की, आत्मशुद्धि के पथ पर आगे बढ़े और संसार को परम कल्याणकारी जैन शासन प्रदान किया।

परमात्मा की देशना सुनने तथा जिन प्रतिमा और जिनवाणी का लाभ प्राप्त होना अनंत पुण्य का परिणाम है।

आत्मा की उन्नति के लिए ये दोनों अमूल्य साधन हैं, जिनका सदुपयोग कर मनुष्य अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।साध्वीश्री ने कहा कि परमात्मा के दर्शन मिलना बड़े सौभाग्य की बात है।

मनुष्य को अपने जीवन का आत्ममंथन करना चाहिए कि उसने कितनी बार परमात्मा के दर्शन किए और कितना समय दर्शन के बिना व्यतीत कर दिया।

84 लाख जीव योनियों में मनुष्य भव प्राप्त होना और श्रावक कुल में जन्म लेना विशेष सौभाग्य है, क्योंकि इसी जीवन में धर्म आराधना और आत्मकल्याण के अवसर प्राप्त होते हैं।उन्होंने कहा कि चौगान मंदिर में पद्मनाभ स्वामी के दर्शन कर मन को अपार आनंद मिलता है।

श्रेणिक महाराजा और कृष्ण महाराजा के संदर्भ में उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारी पूजा और वंदना उनके वीतरागी भावों के प्रति होती है। साधक को परमात्मा के साथ अपने आध्यात्मिक संबंध को समझते हुए उनके आदर्शों को जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।

साध्वीश्री ने कहा कि जीवन ज्वार-भाटे की तरह परिवर्तनशील है। मनुष्य इंद्रियों के वश में होकर स्वयं को पराधीन बना लेता है।

परमात्मा के दर्शन और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए गहरी श्रद्धा तथा दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है। बुराइयों और पाप प्रवृत्तियों से दूर रहने के लिए प्रचंड आत्मबल चाहिए।

कई बार मनुष्य स्वाद और क्षणिक सुख के आकर्षण में पड़कर धर्म की आज्ञाओं की उपेक्षा कर देता है।उन्होंने कहा कि जीवन का प्रत्येक क्षण समाप्त होता जा रहा है, फिर भी मनुष्य वास्तविकता को जानते हुए भी अपनी आदतों और मोह में उलझा रहता है।

परमात्मा की आज्ञा को जीवन में सर्वाेच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।

आत्मा को मलिन करने वाली प्रवृत्तियों का त्याग कर संयम, सदाचार और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ना ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है।धर्मसभा में साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने मधुर गीत प्रस्तुत कर धर्ममय वातावरण बनाया।