उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में गुरुवार को आयोजित नियमित व्याख्यान में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने कहा कि परमात्मा ने प्राणी मात्र को आत्मबोध का मार्ग दिखाने के लिए देशना दी।
उन्होंने कहा कि अनादिकाल से चली आ रही मोह की निद्रा से जागकर अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना ही जीवन का उद्देश्य होना चाहिए।साध्वी श्री ने कहा कि परमात्मा के मंदिर में जाने की दृष्टि सभी की अलग-अलग होती है।
कलाकार प्रतिमा में उसकी कला और भव्यता देखता है, पाषाण का जानकार उसकी गुणवत्ता देखता है, लेकिन भक्त मंदिर में पाषाण या कला नहीं, बल्कि परमात्मा की वीतरागता और स्वरूप के दर्शन करता है।
उन्होंने कहा कि मंदिर में परमात्मा भौतिक वस्तुएं देने के लिए नहीं, बल्कि हमारी दृष्टि और चेतना बदलने के लिए प्रेरणा देते हैं।उन्होंने कहा कि संसार में रहते हुए मोह और आसक्ति में फंसना नहीं चाहिए।
गंदगी पर बैठी मक्खी चिपक जाती है, जबकि रेत के धोरों पर बैठी मक्खी तुरंत उड़ जाती है। इसी प्रकार मनुष्य को संसार में रहते हुए भी मोह-ममता के बंधनों से ऊपर उठने का प्रयास करना चाहिए।साध्वी श्री ने कहा कि घर प्रेम, रिश्तों और संस्कारों से बनता है।
बेटी जब नए घर में प्रवेश करती है तो अपने साथ संस्कारों की सौगात लेकर आती है। संस्कारी बहू पूरे परिवार के वातावरण में सकारात्मक बदलाव ला सकती है।
उन्होंने कहा कि मन में कड़वे शब्दों को संजोकर रखने के बजाय प्रेम को याद रखना चाहिए।
तत्वज्ञान और संस्कारों से युक्त एक बेटी भी पूरे परिवार की दिशा बदल सकती है।इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत किया।