सच्ची आराधना की एक भावुक कहानी -सत्य भूषण शर्मा, उदयपुर (राजस्थान) नवरात्रि की सप्तमी की शाम थी। पूरा शहर लाल चुनरियों, गेंदे के फूलों और दीपों से सजा हुआ था। मंदिर में माँ दुर्गा की भव्य प्रतिमा के सामने अखंड ज्योति जल रही थी। धूप और अगरबत्ती की सुगंध से वातावरण पवित्र हो उठा था। चारों ओर “जय माता दी” के जयघोष गूँज रहे थे।
नयना, पुरु, चिराग, देव, हनी, टिया, आरव, आशु, विक्की और जोनी भी माँ के दर्शन करने मंदिर पहुँचे। सभी के हाथों में फूल और प्रसाद था। किसी ने परीक्षा में सफलता माँगी थी, किसी ने माता-पिता के स्वास्थ्य की कामना की थी, तो कोई अपने परिवार की सुख-शांति के लिए माँ के दरबार में आया था।
आरती शुरू होने ही वाली थी कि अचानक नयना की नजर मंदिर की सीढ़ियों के एक कोने पर पड़ी।
वहाँ एक वृद्धा चुपचाप बैठी थी। उसकी साड़ी जगह-जगह से फटी हुई थी। पैरों में चप्पल नहीं थी। चेहरे पर झुर्रियाँ थीं और आँखों में ऐसा दर्द था, जिसे शब्दों में कहना शायद उसके लिए संभव नहीं था। वह बार-बार मंदिर के भीतर देखती और फिर अपनी नजरें झुका लेती।
नयना का मन भर आया।
वह धीरे से उसके पास बैठ गई। “अम्मा... आप यहाँ अकेली क्यों बैठी हैं?” वृद्धा ने नयना को देखा। कुछ क्षण तक उसके चेहरे को निहारती रही, जैसे किसी अपने को तलाश रही हो। फिर काँपते हाथ से नयना के सिर पर हाथ रखा।
“बेटी... अकेली तो बहुत पहले हो गई थी।”
इतना कहते ही उसकी आँखें छलक पड़ीं। बच्चे उसके आसपास इकट्ठे हो गए। हनी ने पूछा, “अम्मा, आपके घर में कोई नहीं है?”
वृद्धा ने आसमान की ओर देखा। “एक बेटा था... बहुत दूर चला गया। पहले चिट्ठियाँ आती थीं, फिर फोन कम हो गए... और अब कई वर्षों से कोई खबर नहीं। पति भी माँ के पास चले गए। सोचा था, नवरात्रि में माँ के दरबार में आकर शायद मन हल्का हो जाए।”
कुछ पल के लिए वहाँ सन्नाटा छा गया। वृद्धा ने धीमे स्वर में कहा— “सुबह से कुछ खाया भी नहीं है। लेकिन भूख से ज्यादा मन अपनेपन के लिए तरसता है, बेटा।”
यह सुनकर टिया की आँखों से आँसू निकल पड़े। उसने बिना कुछ कहे अपना प्रसाद वृद्धा की हथेली पर रख दिया।
आशु ने अपनी चुन्नी उतारकर उसके कंधों पर डाल दी।
देव पानी लेने दौड़ा। चिराग और विक्की पास की दुकान से भोजन लेकर आए।
पुरु फल ले आया और जोनी दवा और चप्पल लेने चला गया।
जोनी ने वृद्धा के पैरों में चप्पल पहनाई और दवाई दी।
आरव कुछ देर तक चुप खड़ा रहा। फिर उसने माँ की प्रतिमा की ओर देखा और कहा— “हम यहाँ माँ से अपनी खुशियाँ माँगने आए हैं... लेकिन माँ की एक बेटी हमारे सामने भूखी बैठी है। अगर हम इसकी मदद किए बिना आरती में चले गए, तो क्या माँ हमारी पूजा स्वीकार करेंगी?”
यह सुनते ही सभी बच्चों ने वृद्धा के चारों ओर घेरा बना लिया।
उन्होंने उसे अपने हाथों से भोजन कराया। वृद्धा हर निवाला खाते हुए बच्चों को देखती और आँसू पोंछती जाती। अचानक उसने रोटी का एक टुकड़ा हाथ में रोक लिया।
“बेटा... आज मुझे अपनी बेटी की याद आ गई।”
नयना ने उसका हाथ थाम लिया।
“अम्मा, आज से हम सब आपके बच्चे हैं।”
वृद्धा फूट-फूटकर रो पड़ी। उसने नयना को अपने सीने से लगा लिया। “माँ तुम्हें हमेशा खुश रखे, बेटी... आज बहुत दिनों बाद किसी ने मुझे माँ कहा है।”
उसी क्षण मंदिर में आरती की घंटियाँ बज उठीं।
सभी बच्चे वृद्धा को सहारा देकर मंदिर के भीतर ले गए।
देवी की प्रतिमा के सामने पहुँचते ही वृद्धा जमीन पर बैठ गई और दोनों हाथ जोड़कर रोने लगी।
“माँ... मैं आज तुझसे कुछ माँगने नहीं आई थी। बस अपना दुख सुनाने आई थी। लेकिन तूने मेरी सुन ली। तूने मेरे बच्चे मुझसे दूर किए होंगे, पर आज इन बच्चों को मेरे पास भेज दिया।”
उसकी आवाज मंदिर की घंटियों में जैसे घुल गई।
नयना की आँखों से आँसू बहने लगे।
हनी ने सिर झुका लिया।
टिया हाथ जोड़कर खड़ी रही। आरव की आँखें बंद थीं। तभी हवा का एक हल्का झोंका आया। देवी के चरणों में रखा एक लाल फूल धीरे से गिरकर उसी वृद्धा की गोद में आ गिरा।
वृद्धा ने काँपते हाथों से फूल उठाया और उसे अपने हृदय से लगा लिया।
पुजारी यह दृश्य देख रहे थे। उन्होंने बच्चों के पास आकर कहा— “बच्चों, आज माँ ने तुम्हें दर्शन दिए हैं।”
सभी ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा। पुजारी मुस्कुराए— “देवी को चढ़ाए गए फूल कुछ समय बाद मुरझा जाते हैं, दीपक की लौ भी बुझ जाती है, लेकिन किसी टूटे हुए हृदय में जगाई गई आशा कभी नहीं बुझती। आज तुमने जिस माँ के आँसू पोंछे हैं, वहीं देवी का सबसे सच्चा स्वरूप है।”
चिराग ने धीरे से कहा— “अब समझ आया... माँ केवल मंदिर में नहीं रहतीं। माँ तो हर उस दिल में रहती हैं, जो किसी के दर्द को अपना दर्द समझ ले।”
वृद्धा ने बच्चों को आशीर्वाद दिया। उसकी आँखों में अब आँसू तो थे, लेकिन उन आँसुओं में अकेलापन नहीं—ममता और संतोष था।
मंदिर से लौटते समय बच्चों ने पीछे मुड़कर देखा। वृद्धा मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ी हाथ हिला रही थी।
नयना ने हाथ जोड़कर कहा— “माँ, हम अगले नवरात्रि में फिर आएँगे।”
वृद्धा मुस्कुराई। और उस रात बच्चों को पहली बार महसूस हुआ कि उनके साथ केवल मंदिर की याद नहीं लौट रही थी... माँ स्वयं उनके साथ चल रही थीं।
उस दिन उनकी आराधना पूरी हुई थी—क्योंकि उन्होंने देवी की प्रतिमा के सामने दीप जलाने के साथ-साथ एक बुझते हुए जीवन में आशा का दीप भी जला दिया था।
सच्ची आराधना वही है, जहाँ पूजा के बाद हाथ नहीं, किसी का जीवन थामने के लिए आगे बढ़ते हैं।
