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बहुभाषिक परम्पराएँ ही संस्कृति की पोषक: प्रो. गणेश देवी

राजस्थान एसोसिएशन फॉर स्टडीज इन इंग्लिश का 23वां अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर में आरम्भ

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बहुभाषिक परम्पराएँ ही संस्कृति की पोषक: प्रो. गणेश देवी
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जोधपुर, "कथन की बारीकियां : साहित्य व दृश्यश्रव्य माध्यमों के संदर्भ में" विषय पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन शुक्रवार को जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के स्वर्ण जयंती समारोह सभागार में कुलगुरु प्रो. पवन कुमार शर्मा की अध्यक्षता में संपन्न हुआ।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध भाषाविद व आलोचना के लिए केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित पद्मश्री प्रो. गणेश देवी थे।

अपने उद्बोधन में प्रो. देवी ने कहा कि राजसत्ता कॉर्पोरेट के नियंत्रण में है जो वास्तविक यथार्थ के स्थान पर आभासी यथार्थ को स्थापित कर मूल मानवीय संवेदनाओं के स्थान पर अस्वाभाविक तार्किकता को सामान्य साबित करती है और हिंसा को जायज ठहराती है।

वर्तमान समय में कल्पना की जगह स्मृति को प्राथमिकता दी जा रही है। यह युग राजसत्ता के द्वारा पोषित कथन "नैरेटिव" को जनसाधारण के नैरेटिव पर थोपे जाने का युग है।

उन्होंने कहा कि भारत तभी भारत रह पाएगा जब उसमें कथन की बहुलता सुरक्षित रहे। यदि कथन की बहुलता के स्थान पर एक ही नैरेटिव को प्रमुखता दी जाएगी तो वह भारत की प्रकृति के खिलाफ होगा।

उन्होंने भाषा के विलुप्त होते जाने कीप्रकृति पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इन प्रवृत्तियों से राष्ट्र के नागरिक भले बन जाएं, सभ्यता के नागरिक नहीं बन सकते।

कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि राजस्थान एसोसिएशन फॉर स्टडीज इन इंग्लिश की अध्यक्ष प्रो. राजुल भार्गव ने कहा कि कथन का सबसे महत्वपूर्ण भाग उसकी लोचशीलता है।

उच्चारण की नवाचार से युक्त पद्धतियों व स्वर का उच्च व निम्न उतार-चढ़ाव भी अर्थ की गुणवत्ता को बढ़ाता है। ऑस्ट्रेलिया के प्रो. विक गैफ़नी ने कहा कि भाषा में शब्दार्थ के साथ विविधतापूर्ण प्रयोग साहित्य की रमणीयता को बढ़ाते हैं।

रूस की प्रो. इव्जीनिया ज़ारिकोवा ने कहा कि कथन की विभिन्न शैलियाँ विभिन्न भाषा, देशों व परिवेशों में नए अर्थों को जन्म देती हैं।

प्रारंभ में सम्मेलन के विषय का परिचय देते हुए एसोसिएशन के उपाध्यक्ष प्रो. हेमेन्द्र चण्डालिया ने कहा कि श्रुति साहित्य में किसी एक कथा के अनेक रचनात्मक रूप सामने आ सकते हैं और विविधतापूर्ण कथानक होने पर भी वे समाज के सभी वर्गों में स्वीकार्य रहे हैं।

यही भारतीय संस्कृति में स्थित विविधता की शक्ति है। संगठन के महासचिव डा. रघुवंत सिंह ने प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम के प्रारंभ में विभागाध्यक्ष प्रो. सतीश हरित ने स्वागत उद्बोधन दिया। आयोजन सचिव डा. विवेक कुमार पहाड़िया ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

कार्यक्रम में सम्मेलन की स्मारिका, एसोसिएशन के जर्नल व डा. विवेक पहाड़िया तथा विकास की पुस्तक का लोकार्पण किया गया। प्रो. आशुतोष मोहन ने प्रो. एन. एन. जोशी स्मृति व्याख्यान दिया।

दोपहर में यूनिवर्सिटी ऑफ इंजीनियरिंग एण्ड मैनेजमेंट के कुलपति प्रो. बिस्वजॉय चटर्जी का विशेष व्याख्यान हुआ।