जयपुर के त्रिपोलिया गेट के भीतर स्थित सिटी पैलेस, जिसे सवाई मानसिंह संग्रहालय भी कहा जाता है, जंतर मंतर के पास स्थित है और शहर की ऐतिहासिक धरोहरों में प्रमुख स्थान रखता है। इस परिसर में कई प्राचीन इमारतें, प्रांगण, मंदिर और उद्यान हैं जो पर्यटकों को विशेष रूप से आकर्षित करते हैं।
चंद्रमहल इस महल का सबसे प्रमुख भाग है, जिसकी सात मंज़िलों के नाम अलग-अलग हैं और जिसकी सबसे ऊपरी मंज़िल को "कृष्ण मुकुट" कहा जाता है। यहां कभी शाही परिवार निवास करता था। यह महल राजपूत कला और स्थापत्य का बेहतरीन उदाहरण है। वीरेंद्र पोल मुबारक महल की ओर तथा राजेंद्र पोल दीवाने-आम की ओर जाती है। महल के प्रांगण, भित्ति चित्र, प्रीतम निवास के मयूर द्वार, और नीला महल विशेष आकर्षण का केंद्र हैं।
दीवाने-आम में रखे दो विशाल गंगाजली बर्तन विशेष रूप से दर्शनीय हैं। चांदी से निर्मित इन बर्तनों का वजन 345 किलो है और इन्हें 1400 चांदी के सिक्कों को पिघलाकर बनाया गया था। इनकी ऊंचाई 5.2 फीट है। कहा जाता है कि महाराजा सवाई माधोसिंह द्वितीय जब 1902 में इंग्लैंड के राजकुमार एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक में भाग लेने गए थे, तब वे इन बर्तनों में गंगाजल लेकर गए थे। इनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है।
मुबारक महल में राजाओं के काल की दुर्लभ वस्तुएं प्रदर्शित हैं। अस्त्र-शस्त्र, हाथीदांत, क्रिस्टल, सोने-चांदी से जड़ी कटारें, तलवारें, कवच, शंखों से बनी बारूददानियाँ, विभिन्न बंदूकें, बाघनख, गुर्ज, ढालें आदि रोमांचक वस्तुएं बच्चों और वयस्कों दोनों को आकर्षित करती हैं। राजा मानसिंह प्रथम का विशाल खाण्डा भी यहाँ का विशेष आकर्षण है।
महल के ऊपरी खंड में वस्त्र प्रदर्शनी में सवाई माधोसिंह प्रथम का आतमसुख, महाराजा प्रतापसिंह का 320 कली का जामा, महाराजा रामसिंह द्वितीय की अंगरखी, दीपावली पर महारानियों द्वारा पहनी जाने वाली पारंपरिक पोशाकें, बनारसी किमखाब, काश्मीरी शॉल, सांगानेर की छपाई और जयपुरी गोटा-बंधेज जैसे परिधान दर्शकों को विशेष रूप से आकर्षित करते हैं।
मानसिंह महल में शालिग्राम के 146 स्वरूपों वाली दुर्लभ पांडुलिपि और उबेद का फारसी ग्रंथ ‘मशन्वा-गोरहब’ में मुगलकालीन चित्र संग्रहित हैं। मिर्जा राजा जयसिंह द्वारा विभिन्न नगरों से लाए गए सुंदर कालीन इस महल की शोभा बढ़ाते हैं। इनमें से एक पश्मीनी कालीन न्यूयॉर्क के मेट्रोपोलिटन म्यूजियम में भी प्रदर्शित हो चुका है।
यहां पर हाथी के हौदे, अम्बाबाड़ी, पालकी, बग्घी और विभिन्न तख्त भी देखे जा सकते हैं। साथ ही, राजस्थानी, मुगल और दक्खिनी शैली के चित्र, फारसी और अरबी ग्रंथ, ताड़पत्र और हस्तलिखित पुस्तकें संग्रहालय की शोभा हैं।
सिटी पैलेस का निर्माण सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1729 से 1732 के बीच करवाया था। यह शाही निवास और प्रशासनिक केंद्र दोनों था। संग्रहालय प्रतिदिन सुबह 9:30 से शाम 5:00 बजे तक खुला रहता है।